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क्षितिज के पार जाना चाहता हूँ …

नफ़रत मेरी फितरत नही, मैं प्यार की आवाज़ हूँ| मैं अमन के दौर का एक अज़नबी आगाज़ हूँ|| ना हूँ मैं संसार की हर रस्म से वाकिफ| ना ही मैं संसार की हर रस्म से अनजान हूँ ||

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757 comments

Shailesh Kumar Pandey


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तेरा इंसान शायद लापता है

Posted On: 14 Dec, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

24 Comments

आओ हो आयें बचपन से

Posted On: 6 Dec, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

18 Comments

वक़्त लगता ही नही वक़्त गुजर जाता है

Posted On: 28 Nov, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

16 Comments

साथी आते जाते रहना …

Posted On: 20 Jul, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

6 Comments

फकीरों की उम्र तो यहाँ छोटी हुयी है

Posted On: 18 Jul, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

10 Comments

दरिया में सफीने से हम खुद ही उतर गए

Posted On: 31 May, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

12 Comments

आओ आकर खामोशी से अपनी-अपनी बात कहें

Posted On: 4 May, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

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आज वह क्यों मोतियों के अश्रु सा बरसा रहा है ||

Posted On: 11 Apr, 2011  
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कविता में

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I.T. Professionals [झकझकी]

Posted On: 13 Mar, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

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भावना और चेतना

Posted On: 8 Mar, 2011  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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कवि और कुण्ठा

Posted On: 7 Mar, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

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प्रत्याशा

Posted On: 24 Feb, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Lillah

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के द्वारा: rajeev dubey

के द्वारा: Durrat

प्रिय अनुज ,चिंतन के लिए आभार ,, ,विचार का केंद्र है मष्तिष्क ,,एवं भावना का केंद्र है ह्रदय,,और संकल्प (भाई लम्बा खिंच जाएगा ) मष्तिष्क ,विचार ,चिंतन ,मनन इत्यादि करता है,,एवं ह्रदय प्रेम, क्रोध , दोनों में अदभुत एक्य है,, मनुष्य के ह्रदय एवं मष्तिष्क दोनों को ,सुव्यवस्थित,सुनियोजित होना चाहिए ,,, परन्तु यह सुनियोजन बचपन से ही हो तो अत्याधिक प्रभावी होता है ,,हर वह बुरी वस्तु जिसे आप बुरी वस्तु /विचार समझते हो क्या वास्तव में बुरा है ,यथा क्रोध बुरा कह सकते हैं लेकिन यह संकल्प की शक्ति प्रदान करता है परन्तु अगर यह स्थायी रहे तो ,छनिक क्रोध विध्वंस को उत्पन्न करता है,,inner disintegration न होने दें सब सुव्यवस्थित रहेगा ..............जय भारत

के द्वारा: ashvinikumar

श्री चित्रांश जी, आपका बहुत बहुत आभार ............ ---------------------------------------------------------------------------------------- पार निकलने की चाहत में, कागज़ की मत नाव चुनो | दूर न भागो संघर्षों से, क्योंकि अभी धरा है गोल || ----------------------------------------------------------------------------------------- से आशय है, कि प्रतिकूलताओं (दैहिक, दैविक, भौतिक) में, उनसे निजात पाने के लिए अनुचित और असंगत विकल्पों की और कभी मत जाएँ, क्योंकि कभी कभी हमें लगता है कि ये साधन अनुचित ही सही साधन तो हैं, हमारी समस्याओं के निराकरण में महवपूर्ण हैं, किन्तु ऐसा नहीं होता असंगत साधन किसी तरह से आप का बेडा पार नहीं कर सकते क्योंकि वे स्वयं अपने समस्याओं के निराकण के लायक भी नहीं हैं, तो वो आपके लिए उपयोगी कैसे सिद्ध हो सकते हैं ? \"दूर न भागो संघर्षों से, क्योंकि अभी धरा है गोल ||\" संघर्ष करना ही कर्तव्य हैं, पलायन करके आप परेशानियों से अधिक दूर नहीं भाग सकते क्योंकि जब आप परेशानियों से भागना शुरू करते हैं, तब आप इस बात से डरते हैं कि परेशानिया आपको पकड़ ना लें, और इसी भ्रम में आप इस तरह भागते हैं कि आप स्वयं परेशानियों के पंजों में पहुँच जाते हैं | परेशानियों से भागने दायरे बहुत कम हैं, बिलकुल अपनी सीमित धरती की तरह, पर्याप्त भाग दौड़ के बाद भी आपको एक दिन परेशानियों से दो चार होने ही पड़ेगा तो आप क्यों भागते हैं? आप संघर्ष क्यों नहीं करते हैं ? भागिए मत संघर्ष करना सीखिए, गिरना के बाद संभलना सीखिए | यही तो जीवन अप्रतिम का दर्शन है | ---------------------------------------------------------------------------------------------------- आप उस विचारधारा के अनुगामी बनिया जिस धरा के लोगों के लिए http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%86%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%AC%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B0_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE_/_%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A5%87%E0%A4%AF "अज्ञेय" जी लिखते हैं ........ मैंने आहुति बन कर देखा.. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूँ -----------------------------------------------------------------------------------------------------

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: omprakash pareek

के द्वारा: rajeev dubey

के द्वारा: subhash

के द्वारा: palash

प्रिय राजकमल जी | आपने रचना ध्यान से पढ़ा और प्रतिक्रिया दी इसके लिए आपका आभार ... मैं एक निर्बोध अकिंचन, तुमको खोजा करता हूँ, तुम मुझ पर दोष लगाते, अणिमा खोजा करता हूँ | इन पक्तियों का अर्थ है .. हे ईश्वर मैं एक अनजान, अज्ञानी हूँ, मेरे पास कुछ भी (आध्यात्मिक) नहीं है, क्योंकि यहाँ जो है, जो दिखता है वस्तुतः मेरा नहीं है, अतः मैं दरिद्र हूँ | और मैं केवल आपको ही खोजता हूँ, आपका ही सानिध्य पाना चाहता हूँ |और आप में ही विलीन हो जाना चाहता हूँ, और मैं आपका साधक बना रहना चाहता हूँ |  परन्तु आप मुझ पर दोष लगाते हैं की मैं, नश्वर साधन प्राप्ति हेतु अष्ट सिद्धि (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व, वशित्व) प्राप्ति की कामना करता हूँ और इसके लिए आवश्यक सिद्धियों के प्रथम सोपान (सीढ़ी) 'अणिमा' की खोज में रत हूँ | अणिमा:-- इस सिद्धि की प्राप्ति के बाद साधक अणु के सामान लघु रूप बना सकता है, और लोगों की दृष्टि से बच सकता है |

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

ऐसा भी नहीं है की सर्कार पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं दे रही है. मैं एक स्वतंत्र शिक्षक हूँ. अपने शहर के कई सरकारी शिक्षण संस्थानों मैं जा चूका हूँ मैं. आपको एक वाकया सुना दूँ. अभी कुछ दिनों पहले ही मैं अपने पास के एक मध्य विद्याला मैं गया और जो नज़ारा मैंने देखा वो चौंकाने वाला था, शिक्षक क्लास के बहार कुर्सियों पर बैठे थे और बच्चे फिल्ड मैं दौड़ लगा रहे थे. ये हल सिर्फ उस विद्याला का नहीं अपितु हर दुसरे सरकारी शिक्षण संसथान का है. भ्रष्टाचार की जडें बहुत गहरी हो गयी हैं और शिक्षक अपना उत्तरदायित्व भूल गए हैं. वो ये भूल गए हैं की उनकी गुरु दक्षिण बच्चों का उज्जवल भविष्य है. जबतक शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेंगे, शिक्षा के क्षेत्र मैं क्रांति नहीं आएगी.

के द्वारा: Nikhil

के द्वारा: SHRIPRAKASH POONIA

के द्वारा: जलाल

के द्वारा: Ashutosh "Ambar"

के द्वारा: manoj




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